आओ आओ आमिर खान
टार्च उठाओ आमिर खान
नाच दिखाओ आमिर खान
मूर्ख बनाओ आमिर खान
बड़े ब्रांड की दूकानों के
आगे देखो खड़े शिखंडी
बातों से हम बहल जायेंगे
बात बनाओ, ओ पाखंडी
ब्रांड राजदूतों को देखो
पैसौं के लालच में आकर
कुत्ते जैसे हांफ रहे है
पूछ हिलाते, टार्च उठाकर
तिब्बत वाले, मूरख साले
कल मरते तो अब मर जायें
हम तो खुश हैं, हमें पड़ी क्या
चीनी इसे गप्प कर जायें.
बन्द करो इन्डिया गेट को
विजय चौक पर ताले डालो
मुश्कें कस कर मानवता की
आओ अपनी टार्च निकालो
मेरा क्या मैं तो लल्लू हूं
तुम तो चालू रखो दुकान
जाय भाड में हिन्दुस्तान
आओ आओ आमिर खान
April 17, 2008
हीरानन्द सच्चिदानन्द वात्सायन अज्ञेय की पत्रकारिता को को आप दिनमान से जानते हैं. लेकिन क्या आप बता सकते हैं अज्ञेय आगरे के किस अखबार से जुड़े रहे थे?
वो कौन सा अखबार था जिसके जवाहरलाल नेहरू, आचार्य जेबी कृपलानी जैसी हस्तियां मात्र संवाददाता के तौर पर जुड़ी हुईं थीं? (more…)
March 24, 2008
बेटियां फूलों का गहना है,
बैटियों ने दर्द पहना हैं
बेटियां खिल खिल हंसाती हैं
बेटियां बेहिस रुलातीं हैं
बेटिया हंसतीं हैं गातीं है.
बेटिया घर छोड़ जातीं हैं. (more…)
January 25, 2008
तुर्रा और कलंगी, चंग बजाकर मनमौजी गाने वालों के दो समूह होते थे. ये दोनों समूहों के लोग एक दूसरे की लिखे हुये से अपने लिखे को भिड़ाते गाते थे.
तुर्रा और कलंगी की शुरूआत आगरे से हुई. जनकवि शायर नज़ीर अकबराबादी ने अबध की इश्क-मुश्किया शायरी या दिल्ली की सूफी प्रेम विरह शायरी के विपरीत आम आदमी पर लिखा, गाया, गवाया और बजबाया. नज़ीर साहब ने बाजरे की रोटी, तिल के लड्डू, तैराकी, रीछ के बच्चे से लेकर ककड़ियों तक पर लिखा. आम आदमी के लिखे के दीवाने तो आम आदमी ही होने थे. यही थे नज़ीर साहब के असली चेले चपाटे. (more…)
January 10, 2008