बेटियां बेहिस रुलातीं हैं
बेटी दिवस पर जिसके बेटी ही न हो वो क्या लिखेगा? साल की शुरूआत में हमने भी बेटियों के ऊपर एक कविता लिखी थी सो इसी को प्रस्तुत कर देते हैं. लल्लू हूं, सो बात तो लल्लूपने की ही होगी. (more…)
3 comments September 29, 2008
थोड़े से गदहों की खातिर परेशान हैं क्यों माता जी;
कल पंगेबाज जी ने एक राजनीतिक हस्ती द्वारा दूसरे राजनीतिक हस्ती के पास अपने गधे भाग जाने की शिकायत करते हुये लिखी एक चिठ्ठी लीक की थी. दूसरे राजनीतिक ने इस चिठ्ठी को अपने संकटमोचन को दे दिया था. संकटमोचन जी ने भी इस चिठ्ठी का जबाब एक कविता में दिया है. लीजिये इस चिठ्ठी से कुछ अंश.
थोड़े से गदहों की खातिर परेशान हैं क्यों माता जी.
गदहे बैठे हैं मंडी में, जाकर के पईसा फैंकेगे.
सारे गदहे छोड दुलत्ती, बात हमारी पर रेंकेगें.
प्रांत प्रांत से, किसिम किसिम के, सारे गदहे लाकर दूगां;
गंदा है पर धंधा है ये, दो परसेन्ट दलाली लूंगा
मनमोहन को धता बताओ, इन्हें नहीं कुछ भी आता जी
थोड़े से गदहों की खातिर परेशान हैं क्यों माता जी;
बुरे वक्त संगी हूं मैं, सबकी बिगड़ी बात बनाता
अमित अनिल से पूछो मैय्या, और मुझे क्या आता जाता
फिलिम नगरिया, बिजनिस बाजी, बना रहे मेरा याराना
इच्चक दाना, बिच्चक दाना, राजनीति का रेवड़खाना
चन्दामामा, बुश ओबामा, सबसे है मेरा नाता जी
थोड़े से गदहों की खातिर परेशान हैं क्यों माता जी.
1 comment July 13, 2008
आगरे के अखबार
हीरानन्द सच्चिदानन्द वात्सायन अज्ञेय की पत्रकारिता को को आप दिनमान से जानते हैं. लेकिन क्या आप बता सकते हैं अज्ञेय आगरे के किस अखबार से जुड़े रहे थे?
वो कौन सा अखबार था जिसके जवाहरलाल नेहरू, आचार्य जेबी कृपलानी जैसी हस्तियां मात्र संवाददाता के तौर पर जुड़ी हुईं थीं? (more…)
4 comments March 24, 2008
हिन्दी ब्लागिंग पर सोमरस ठाकुर की ये कविता सुनिये.
सोमरस ठाकुर आगरे से हैं और ब्रम्हांड के सबसे बड़े कवि है उसी तरह जैसे आलोक पुराणिक इस ब्रम्हांड के सबसे बड़े लेखक हैं. (more…)
12 comments March 19, 2008
बेटियां फूलों का गहना है,
बेटियां फूलों का गहना है,
बैटियों ने दर्द पहना हैं
बेटियां खिल खिल हंसाती हैं
बेटियां बेहिस रुलातीं हैं
बेटिया हंसतीं हैं गातीं है.
बेटिया घर छोड़ जातीं हैं. (more…)
2 comments January 25, 2008
मेरी कलंगी का बोलबाला, वो तेरा तुर्रा लटक रहा है.
तुर्रा और कलंगी, चंग बजाकर मनमौजी गाने वालों के दो समूह होते थे. ये दोनों समूहों के लोग एक दूसरे की लिखे हुये से अपने लिखे को भिड़ाते गाते थे.
तुर्रा और कलंगी की शुरूआत आगरे से हुई. जनकवि शायर नज़ीर अकबराबादी ने अबध की इश्क-मुश्किया शायरी या दिल्ली की सूफी प्रेम विरह शायरी के विपरीत आम आदमी पर लिखा, गाया, गवाया और बजबाया. नज़ीर साहब ने बाजरे की रोटी, तिल के लड्डू, तैराकी, रीछ के बच्चे से लेकर ककड़ियों तक पर लिखा. आम आदमी के लिखे के दीवाने तो आम आदमी ही होने थे. यही थे नज़ीर साहब के असली चेले चपाटे. (more…)
Add comment January 10, 2008


