थोड़े से गदहों की खातिर परेशान हैं क्यों माता जी;
जुलाई 13, 2008 को 5:15 पूर्वाह्न पर | Posted in लल्लूपना | 1 टिप्पणीटैग: pangebaj
कल पंगेबाज जी ने एक राजनीतिक हस्ती द्वारा दूसरे राजनीतिक हस्ती के पास अपने गधे भाग जाने की शिकायत करते हुये लिखी एक चिठ्ठी लीक की थी. दूसरे राजनीतिक ने इस चिठ्ठी को अपने संकटमोचन को दे दिया था. संकटमोचन जी ने भी इस चिठ्ठी का जबाब एक कविता में दिया है. लीजिये इस चिठ्ठी से कुछ अंश.
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आगरे के अखबार
मार्च 24, 2008 को 12:05 पूर्वाह्न पर | Posted in बात पुरानी है | 5s टिप्पणियाँटैग: AAj ka Hungama, Agra Journalism, Amar Ujala, Dori Lal Agarwal, Ganpati Chandra Kela, Krishna Dutt Paliwal, Murari Lal Maheshwari, Sainik, Ujala
हीरानन्द सच्चिदानन्द वात्सायन अज्ञेय की पत्रकारिता को को आप दिनमान से जानते हैं. लेकिन क्या आप बता सकते हैं अज्ञेय आगरे के किस अखबार से जुड़े रहे थे?
वो कौन सा अखबार था जिसके जवाहरलाल नेहरू, आचार्य जेबी कृपलानी जैसी हस्तियां मात्र संवाददाता के तौर पर जुड़ी हुईं थीं? Continue Reading आगरे के अखबार…
हिन्दी ब्लागिंग पर सोमरस ठाकुर की ये कविता सुनिये.
मार्च 19, 2008 को 10:05 पूर्वाह्न पर | Posted in लल्लूपना | 12s टिप्पणियाँसोमरस ठाकुर आगरे से हैं और ब्रम्हांड के सबसे बड़े कवि है उसी तरह जैसे आलोक पुराणिक इस ब्रम्हांड के सबसे बड़े लेखक हैं. Continue Reading हिन्दी ब्लागिंग पर सोमरस ठाकुर की ये कविता सुनिये….
बेटियां फूलों का गहना है,
जनवरी 25, 2008 को 3:18 अपराह्न पर | Posted in दिल हुम हुम करे | 2s टिप्पणियाँबेटियां पछुआ हवा हैं.
बेटियां जैसे दुआ हैं
फूल जैसी पांखुरीं हैं
कुह कुहाती बांसुरीं है
बेटियां फूलों का गहना है,
बैटियों ने दर्द पहना हैं
बेटियां खिल खिल हंसाती हैं
बेटियां बेहिस रुलातीं हैं
बेटिया हंसतीं हैं गातीं है.
बेटिया घर छोड़ जातीं हैं.
बेटियों का पर्स बाबुल कैसे भूले
हाथ का स्पर्श बाबुल कैसे भूले
आप तुम का फर्क बाबुल कैसे भूले
पंचमी का हर्ष बाबुल कैसे भूले
बेटियों से हीन घर में
मेरे बेटों से ब्याह कर
घर में आती बेटियां हैं
जिसको गोदी में झुलाया
जिसको आखों में बसाया
जिसको ना इक पल भुलाया
उसको अपने साथ लेकर
दूर मुझसे,
घर बसाती बेटियां हैं.
मैं तो ससुरा हूं, मुझे मालूम है क्या
बेटियों की पीर है क्या? पर पता है
बेटियों के बाप जो सहते हैं पीड़ा
मैं भी उसको सह रहा हूं
बस यही मैं कह रहा हूं
बेटियां बेहिस रुलातीं हैं
बेटिया घर छोड़ जाती हैं
मेरी कलंगी का बोलबाला, वो तेरा तुर्रा लटक रहा है.
जनवरी 10, 2008 को 1:43 पूर्वाह्न पर | Posted in बात पुरानी है | Leave a commentटैग: कलंगी, तुर्रा
तुर्रा और कलंगी, चंग बजाकर मनमौजी गाने वालों के दो समूह होते थे. ये दोनों समूहों के लोग एक दूसरे की लिखे हुये से अपने लिखे को भिड़ाते गाते थे.
तुर्रा और कलंगी की शुरूआत आगरे से हुई. जनकवि शायर नज़ीर अकबराबादी ने अबध की इश्क-मुश्किया शायरी या दिल्ली की सूफी प्रेम विरह शायरी के विपरीत आम आदमी पर लिखा, गाया, गवाया और बजबाया. नज़ीर साहब ने बाजरे की रोटी, तिल के लड्डू, तैराकी, रीछ के बच्चे से लेकर ककड़ियों तक पर लिखा. आम आदमी के लिखे के दीवाने तो आम आदमी ही होने थे. यही थे नज़ीर साहब के असली चेले चपाटे. Continue Reading मेरी कलंगी का बोलबाला, वो तेरा तुर्रा लटक रहा है….
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