मेरी कलंगी का बोलबाला, वो तेरा तुर्रा लटक रहा है.

January 10, 2008

तुर्रा और कलंगी, चंग बजाकर मनमौजी गाने वालों के दो समूह होते थे. ये दोनों समूहों के लोग एक दूसरे की लिखे हुये से अपने लिखे को भिड़ाते गाते थे.

तुर्रा और कलंगी की शुरूआत आगरे से हुई. जनकवि शायर नज़ीर अकबराबादी ने अबध की इश्क-मुश्किया शायरी या दिल्ली की सूफी प्रेम विरह शायरी के विपरीत आम आदमी पर लिखा, गाया, गवाया और बजबाया. नज़ीर साहब ने बाजरे की रोटी, तिल के लड्डू, तैराकी, रीछ के बच्चे से लेकर ककड़ियों तक पर लिखा. आम आदमी के लिखे के दीवाने तो आम आदमी ही होने थे. यही थे नज़ीर साहब के असली चेले चपाटे.

नज़ीर साहब के बाद में आगरे से शुरू हुई आम आदमी की गायकी फैलती गई. अब जनाब खेमेबंदी तो हर जगह फैल ही जाती है. बस इनमें भी फैल गयी. बात पहुंची बादशाह तक. कौन से खेमा बड़ा है और कोन सा छोटा. बादशाह ने सुना और फैसला दिया कि दोनों समूह् सिर पर पहनने वाली पगड़ी पर लगे तुर्रे और कलंगी की तरह है. न कोई छोटा न कोई बड़ा. तो इसी तरह एक खेमे के लोग तुर्रेवाले और दूसरे खेमे के लोग कलंगीवाले कहलाये. इनकी गायकी फैलते फैलते सारे पश्चिमी उत्तर प्रदेश में फैल गयी. और बकौल इरफान भाई अबध के इलाके में भी तुर्रा और कलंगी के दीवाने मौजूद हैं.

इनकी चंग पर बजाकर गाने वाली गायकी को ये लोग ख्यालगोई कहते थे. ब्रज की ख्यालगोई पारंपरिक ख्याल गोई न होकर चंग पर मौज मस्ती में कुछ विशेष धुनों पर होती थी. रोटी, कपड़ा और मकान की “तेरी दो टकियां दी नौकरी” और “ताजा कली खिली है हम उसके दीवाने हैं” इन्हीं तुर्रा और कलंगी की गायकी की धुनें हैं.

नज़ीर साहब की परम्परा से निकले ख्यालगोई, ब्रज के स्वांग, भगत, रसिये, चिकाड़े पर गाया जाने वाला ढोला अब सब अतीत की बाते ही रह गयीं है. अब कहीं भी गायकी के सवाल जबाब नहीं होते, कोई तुर्रेवाला नही कहता कि

यार हम तुर्रे वाले हैं
हमारे ठाठ निराले हैं.

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