बेटियां फूलों का गहना है,

January 25, 2008 at 3:18 pm | In दिल हुम हुम करे | 2 Comments

बेटियां फूलों का गहना है,
बैटियों ने दर्द पहना हैं
बेटियां खिल खिल हंसाती हैं
बेटियां बेहिस रुलातीं हैं
बेटिया हंसतीं हैं गातीं है.
बेटिया घर छोड़ जातीं हैं.

बेटियां पछुआ हवा हैं.
बेटियां जैसे दुआ हैं
फूल की इक पांखुरीं हैं
कुह कुहाती बांसुरीं है

बेटियों का पर्स बाबुल कैसे भूले
हाथ का स्पर्श बाबुल कैसे भूले
आप तुम का फर्क बाबुल कैसे भूले
पंचमी का हर्ष बाबुल कैसे भूले

बेटियों से हीन घर में
मेरे बेटों को ब्याह कर
घर में आती बेटियां हैं

जिसको गोदी में झुलाया
जिसको आखों में बसाया
जिसको ना इक पल भुलाया
उसको अपने साथ लेकर
दूर मुझसे,
घर बसाती बेटियां हैं.

मैं तो ससुरा हूं,
मुझे मालूम है क्या
बेटियों की पीर है क्या?
कैसे जानूं?
पर पता है
एक बेटी मेरे बेटे को जुदा कर
साथ अपने ले गयी है.

बेटियों के बाप जो सहते हैं पीड़ा
मैं भी उसको सह रहा हूं
बस यही मैं कह रहा हूं

बेटियां बेहिस रुलातीं हैं
बेटिया घर छोड़ जाती हैं

2 Comments »

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  1. bahut sundar rachana sahi aur satya betiyam khushiyan lati hai,rulati hai aur ghar bhi chod jati hai

  2. यह तो बहुत मार्मिक है। सही अनुभूति वही कर सकाता है जिसने बिटिया का बिछोह देखा – महसूस किया हो।
    आप बहुत बढ़िया लिखते हैं।


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