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मेरी कलंगी का बोलबाला, वो तेरा तुर्रा लटक रहा है.

तुर्रा और कलंगी, चंग बजाकर मनमौजी गाने वालों के दो समूह होते थे. ये दोनों समूहों के लोग एक दूसरे की लिखे हुये से अपने लिखे को भिड़ाते गाते थे.

तुर्रा और कलंगी की शुरूआत आगरे से हुई. जनकवि शायर नज़ीर अकबराबादी ने अबध की इश्क-मुश्किया शायरी या दिल्ली की सूफी प्रेम विरह शायरी के विपरीत आम आदमी पर लिखा, गाया, गवाया और बजबाया. नज़ीर साहब ने बाजरे की रोटी, तिल के लड्डू, तैराकी, रीछ के बच्चे से लेकर ककड़ियों तक पर लिखा. आम आदमी के लिखे के दीवाने तो आम आदमी ही होने थे. यही थे नज़ीर साहब के असली चेले चपाटे. (more…)


Add comment January 10, 2008


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